श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 198: देवर्षि नारदद्वारा शिबिकी महत्ताका प्रतिपादन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.198.15 
अथ कदाचित् पुनरप्यहमुपस्थित: पुनरेव च रथप्रयोजनमासीत्। सम्यगयमेष भगवत इत्येवं राजाब्रवीदिति पुनरेव तृतीयं स्वस्तिवाचनं समभावयमथ राजा ब्राह्मणानां दर्शयन् मामभिप्रेक्ष्याब्रवीत्। अथो भगवता पुष्परथस्य स्वस्तिवाचनानि सुष्ठु सम्भावितानि एतेन द्रोहवचने नावतरेत्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
'इसके बाद एक दिन और मैं राजा के यहाँ गया। पुनः मेरे जाने का उद्देश्य पुष्परथ को प्राप्त करना था। उस दिन भी राजा ने बड़े सत्कार से मेरा स्वागत किया और कहा- 'प्रभु! यह रथ आपका है।' फिर तीसरी बार मैं उनके यहाँ गया और स्वस्तिवाचन का कार्य पूर्ण किया। राजा ने ब्राह्मणों को रथ दिखाते हुए मेरी ओर देखा और कहा- 'प्रभु! तुमने पुष्परथ के लिए अच्छा स्वस्तिवाचन किया।' (ऐसा कहकर भी उन्होंने रथ नहीं दिया।) इस (छलपूर्ण) कथन के कारण वसुमना स्वर्ग से पृथ्वी पर सबसे पहले अवतरित होंगी।'॥15॥
 
‘After that one more day I went to the king's place. Again the purpose of my visit was to get Pushparatha. That day also the king welcomed me with great hospitality and said- 'Lord! This chariot is yours.' Then for the third time I went to his place and completed the task of reciting the swastivachan. The king while showing the chariot to the Brahmins looked at me and said- 'Lord! You recited good swastivachan for Pushparatha.' (Even after saying this he did not give the chariot.) Because of this (deceitful) statement Vasumana will be the first to descend from heaven to earth.'॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)