श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 198: देवर्षि नारदद्वारा शिबिकी महत्ताका प्रतिपादन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.198.1 
वैशम्पायन उवाच
भूय एव महाभाग्यं कथ्यतामित्यब्रवीत् पाण्डवो मार्कण्डेयम्। अथाचष्ट मार्कण्डेय:। अष्टकस्य वैश्वामित्रेरश्वमेधे सर्वे राजान: प्रागच्छन्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर ने पुनः मार्कण्डेयजी से प्रार्थना की- 'मुने! क्षत्रिय राजाओं की महिमा का पुनः वर्णन करो।' तब मार्कण्डेयजी ने कहा- 'धर्मराज! विश्वामित्र के पुत्र अष्टक के अश्वमेध्ययज्ञ में सभी राजा आये थे। 1॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Pandunandan Yudhishthir again prayed to Markandeyaji – ‘Mune! Describe again the greatness of the Kshatriya kings.' Then Markandeyaji said - 'Dharamraj! All the kings had come to the Ashwamedhyayagya of Vishwamitra's son Ashtaka. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)