श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 197: इन्द्र और अग्निद्वारा राजा शिबिकी परीक्षा  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.197.17 
राजोवाच
उक्षाणं वेहतमनूनं नयन्तु
ते पश्यन्तु पुरुषा ममैव।
भयाहितस्य दायं ममान्तिकात् त्वां
प्रत्याम्नायं तु त्वं ह्येनं मा हिंसी:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
राजा ने कहा- गरुड़! उक्ष (ऋषभकण्ड) या वेहत नामक औषधियाँ बहुत पौष्टिक होती हैं। मेरे सेवक जाकर उन्हें खोजकर लाएँ और उन्हें पर्याप्त मात्रा में चावल के साथ पकाकर तुम्हारे पास ले आएँ। भयभीत कबूतर के बदले मैं तुम्हें यही उचित मूल्य दूँगा। इसे ले लो, परन्तु इस कबूतर को मत मारना॥17॥
 
The king said— Eagle! Medicines called Ukshha (Rishabhkand) or Vehat are very nutritious. My servants should go and search for them and cook them with rice in sufficient quantity and bring them to you. This will be the fair price I will give you in exchange for the frightened pigeon. Take it, but do not kill this pigeon.॥17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)