श्लोक 1: वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर ने मार्कण्डेयजी से पुनः अनुरोध किया- 'भगवन! तो फिर मुझे क्षत्रियों की महिमा बताओ। 1॥
श्लोक 2: तब मार्कण्डेयजी बोले- 'महाराज! प्राचीन काल में वृषदर्भ और सेडुक नामक दो राजा हुए थे। वे दोनों ही नीतिमार्ग पर चलने वाले तथा अस्त्र-शस्त्र आदि विद्याओं के ज्ञाता थे।'
श्लोक 3: वृषदर्भ ने बचपन से ही गुप्त प्रतिज्ञा कर रखी थी कि ‘ब्राह्मण को सोना-चाँदी के अतिरिक्त कुछ भी नहीं देना चाहिए (अर्थात् उसे केवल सोना-चाँदी ही देना चाहिए)।’ सेदुक को उनकी इस प्रतिज्ञा का ज्ञान था॥3॥
श्लोक 4-6: एक दिन वेदों में पारंगत एक ब्राह्मण राजा सेदुक के पास आया और उसे आशीर्वाद देकर गुरुदक्षिणा माँगते हुए बोला, ‘राजन्! मुझे एक हजार घोड़े दीजिए।’ तब सेदुक ने ब्राह्मण से कहा, ‘ब्राह्मण! मेरे लिए आपको इच्छित गुरुदक्षिणा देना संभव नहीं है।॥ 4-6॥
श्लोक 7: अतः तुम वृषदर्भ के पास जाओ। हे ब्राह्मण! राजा वृषदर्भ धर्म के बड़े ज्ञाता हैं। तुम उनसे प्रार्थना करो। वे तुम्हें अवश्य ही इच्छित वस्तु प्रदान करेंगे। यह उनका गुप्त नियम है।॥7॥
श्लोक 8: तब ब्राह्मण देवता ने वृषदर्भ के पास जाकर एक हजार घोड़े मांगे। यह सुनकर राजा ने उसे कोड़े से पीटना आरम्भ कर दिया॥8॥
श्लोक 9: यह देखकर ब्राह्मण ने उनसे पूछा - 'हे राजन! आप मुझ निरपराध को क्यों मार रहे हैं?'॥9॥
श्लोक 10: ऐसा कहकर वह ब्राह्मण उसे शाप देने के लिए तैयार हो गया। तब राजा ने उससे कहा- 'विप्रवर! जो आपको अपना धन नहीं देता, क्या उसे शाप देना उचित है? अथवा ब्राह्मण का यही उचित कर्म है?'॥10॥
श्लोक 11: ब्राह्मण बोला, 'हे राजाओं के राजा! राजा सेदुका ने मुझे आपके पास भेजा है, इसलिए मैं आपसे गुरु दक्षिणा माँगने आया हूँ। उन्हीं के कहने पर मैंने आपसे यह प्रार्थना की है।'॥11॥
श्लोक 12: राजा ने कहा - हे ब्राह्मण! आज जो भी राजकर मेरे पास आएगा, वह मैं कल प्रातःकाल तुम्हें दे दूँगा। कोड़े से पीटे हुए को खाली हाथ कैसे लौटाया जा सकता है?॥12॥
श्लोक 13: यह कहकर राजा ने ब्राह्मण को अपनी एक दिन की आय दे दी, इस प्रकार उसने एक हजार से भी अधिक घोड़ों की कीमत बता दी।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥