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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 195: राजा ययातिद्वारा ब्राह्मणको सहस्र गौओंका दान  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.195.1 
मार्कण्डेय उवाच
इदमन्यच्छ्रूयतां ययातिर्नाहुषो राजा राज्यस्थ: पौरजनावृत आसांचक्रे गुर्वर्थी ब्राह्मण उपेत्याब्रवीद् भो राजन् गुर्वर्थं भिक्षेयं समयादिति॥ १॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेय कहते हैं - युधिष्ठिर, अब एक अन्य क्षत्रिय राजा का माहात्म्य सुनो। उन्हीं दिनों की बात है जब नहुष के पुत्र राजा ययाति नगरवासियों से घिरे हुए सिंहासन पर विराजमान थे, तभी एक ब्राह्मण गुरु दक्षिणा में भिक्षा मांगने की इच्छा से उनके पास आया और बोला - 'राजन, मुझे गुरु दक्षिणा में भिक्षा चाहिए, किन्तु इसके साथ एक शर्त है।'
 
Markandeya says - Yudhishthira, now listen to the importance of another Kshatriya king. It was during those days when King Yayati, son of Nahush, was sitting on the throne surrounded by the people of the city, that a Brahmin came to him with the desire to ask for alms as Guru Dakshina and said - 'King, I want alms as Guru Dakshina, but there is a condition with it.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)