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mahabharat 3.193.34-35: जो प्रतिदिन अतिथियों को भोजन कराकर बचे हुए अन्न से काम चलाता है, उसे अतिथि ब्राह्मण द्वारा प्रतिदिन खाए गए भोजन के कौर के बराबर हजार गौओं के दान का पुण्य प्राप्त होता है और उसके द्वारा युवावस्था में किए गए समस्त पाप अवश्य ही नष्ट हो जाते हैं ॥ 34-35॥   |   mahabharat अध्याय 3.193: इन्द्र और बक मुनिका संवाद   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 193: इन्द्र और बक मुनिका संवाद  »  श्लोक 34-35
 
 
श्लोक  3.193.34-35 
दत्त्वा यस्त्वतिथिभ्यो वै भुङ्‍‍क्ते तेनैव नित्यश:।
यावतो ह्यन्धस: पिण्डानश्नाति सततं द्विज:॥ ३४॥
तावतां गोसहस्राणां फलं प्राप्नोति दायक:।
यदेनो यौवनकृतं तत् सर्वं नश्यते ध्रुवम्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
जो प्रतिदिन अतिथियों को भोजन कराकर बचे हुए अन्न से काम चलाता है, उसे अतिथि ब्राह्मण द्वारा प्रतिदिन खाए गए भोजन के कौर के बराबर हजार गौओं के दान का पुण्य प्राप्त होता है और उसके द्वारा युवावस्था में किए गए समस्त पाप अवश्य ही नष्ट हो जाते हैं ॥ 34-35॥
 
One who daily gives food to guests and makes do with the leftover food, the donor gets the merit of donating as many thousand cows as the number of mouthfuls of his food that the guest Brahmin eats daily. And all the sins committed by him in his youth are certainly destroyed. ॥ 34-35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)