श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 193: इन्द्र और बक मुनिका संवाद  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.193.20 
नान्यद् दु:खतरं किञ्चिल्लोकेषु प्रतिभाति मे।
अर्थैर्विहीन: पुरुष: परै: सम्परिभूयते॥ २०॥
 
 
अनुवाद
मैं संसार में इससे अधिक दुःखदायी कोई बात नहीं सोच सकता कि एक दरिद्र मनुष्य को दूसरों से तिरस्कार सहना पड़े ॥20॥
 
I cannot think of anything more painful in the world than a poor man having to face contempt from others. ॥20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)