श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 193: इन्द्र और बक मुनिका संवाद  »  श्लोक 10-12
 
 
श्लोक  3.193.10-12 
आश्रमांश्च विचित्रांश्च नदीश्च विविधा: शुभा:।
नगराणि समृद्धानि खेटान् जनपदांस्तथा॥ १०॥
प्रजापालनदक्षांश्च नरेन्द्रान् धर्मचारिण:।
उदपानं प्रपा वापी तडागानि सरांसि च॥ ११॥
नाना ब्रह्मसमाचारै: सेवितानि द्विजोत्तमै:।
ततोऽवतीर्य रम्यायां पृथ्व्यां राजञ्छतक्रतु:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
राजन! विचित्र आश्रमों, नाना प्रकार की शुभ नदियों, समृद्ध नगरों, ग्रामों, जनपदों, प्रजापालन में निपुण धर्मात्मा राजाओं, कुओं, तालाबों, बावड़ियों, तालाबों और ब्रह्मचारी-निष्ठ श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा सेवित असंख्य सरोवरों को देखकर शतक्रतु इन्द्र सुन्दर देश में उतरे॥10-12॥
 
Rajan! Seeing the strange ashrams, various types of auspicious rivers, prosperous cities, villages, districts, virtuous kings who were adept at caring for the people, wells, ponds, wells, ponds and innumerable lakes served by celibate-devoted best Brahmins, Shatkratu Indra landed in a beautiful land. 10-12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)