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श्लोक 3.192.69  |
राजपुत्र्युवाच
यथा युक्ता वामदेवाहमेनं
दिने दिने संदिशन्ती नृशंसम्।
ब्राह्मणेभ्यो मृगयती सूनृतानि
तथा ब्रह्मन् पुण्यलोकं लभेयम्॥ ६९॥ |
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| अनुवाद |
| राजकुमारी बोली - वामदेवजी ! मैं अपने कठोर स्वभाव वाले स्वामी को प्रतिदिन सावधान रहने और मधुर वचन बोलने की सलाह देती रहती हूँ और स्वयं भी ब्राह्मणों की सेवा के अवसर खोजती रहती हूँ । ब्रह्मन् ! इन शुभ कर्मों के कारण मुझे पुण्यलोक की प्राप्ति हो । 69॥ |
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| The princess said – Vaamdevji! I keep advising my harsh natured master to be careful and speak sweet words every day and I myself look for opportunities to serve the Brahmins. Brahman! Because of these good deeds, may I attain the world of virtue. 69॥ |
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