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mahabharat 3.192.69: राजकुमारी बोली - वामदेवजी ! मैं अपने कठोर स्वभाव वाले स्वामी को प्रतिदिन सावधान रहने और मधुर वचन बोलने की सलाह देती रहती हूँ और स्वयं भी ब्राह्मणों की सेवा के अवसर खोजती रहती हूँ । ब्रह्मन् ! इन शुभ कर्मों के कारण मुझे पुण्यलोक की प्राप्ति हो । 69॥   |   mahabharat अध्याय 3.192: इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित् का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 192: इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित् का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता  »  श्लोक 69
 
 
श्लोक  3.192.69 
राजपुत्र्युवाच
यथा युक्ता वामदेवाहमेनं
दिने दिने संदिशन्ती नृशंसम्।
ब्राह्मणेभ्यो मृगयती सूनृतानि
तथा ब्रह्मन् पुण्यलोकं लभेयम्॥ ६९॥
 
 
अनुवाद
राजकुमारी बोली - वामदेवजी ! मैं अपने कठोर स्वभाव वाले स्वामी को प्रतिदिन सावधान रहने और मधुर वचन बोलने की सलाह देती रहती हूँ और स्वयं भी ब्राह्मणों की सेवा के अवसर खोजती रहती हूँ । ब्रह्मन् ! इन शुभ कर्मों के कारण मुझे पुण्यलोक की प्राप्ति हो । 69॥
 
The princess said – Vaamdevji! I keep advising my harsh natured master to be careful and speak sweet words every day and I myself look for opportunities to serve the Brahmins. Brahman! Because of these good deeds, may I attain the world of virtue. 69॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)