श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 192: इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित् का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  3.192.66 
वामदेव उवाच
यत् त्वमेनं सायकं घोररूपं
विषेण दिग्धं मम संदधासि।
न त्वेतं त्वं शरवर्षं विमोक्तुं
संधातुं वा शक्यसे मानवेन्द्र॥ ६६॥
 
 
अनुवाद
वामदेव जी बोले - हे मनुष्यों के स्वामी! आप मुझे मारने के लिए इस विष में डूबे हुए विशाल बाण को धनुष पर चढ़ा रहे हैं, किन्तु मैं आपसे कहता हूँ कि आप इस बाण को न तो धनुष पर चढ़ा सकेंगे और न ही छोड़ सकेंगे।
 
Vaamdev Ji said - O Lord of men! You are putting this huge arrow dipped in poison on the bow to kill me, but I tell you that you will neither be able to put this arrow on the bow nor will you be able to release it.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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