श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 192: इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित् का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  3.192.64 
मार्कण्डेय उवाच
एवमुक्तो वामदेवेन राज-
न्नन्त:पुरे राजपुत्रं जघान।
स सायकस्तिग्मतेजा विसृष्ट:
श्रुत्वा दलस्तत्र वाक्यं बभाषे॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेयजी कहते हैं - हे राजन! वामदेवजी के ऐसा कहते ही वह शक्तिशाली एवं तेजस्वी बाण धनुष से छूटकर महल के अन्दर चला गया और राजकुमार को मार डाला। यह समाचार सुनकर दल वहाँ लौट आया और उसने यह कहा -॥64॥
 
Markandeya says - O King! As soon as Vaamdev said this, that powerful and brilliant arrow got freed from the bow and went inside the palace and killed the prince. On hearing this news, Dala returned there and said this -॥ 64॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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