श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 192: इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित् का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  3.192.63 
वामदेव उवाच
जानामि पुत्रं दशवर्षं तवाहं
जातं महिष्यां श्येनजितं नरेन्द्र।
तं जहि त्वं मद्वचनात् प्रणुन्न-
स्तूर्णं प्रियं सायकैर्घोररूपै:॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
वामदेव बोले - हे नरेन्द्र! मैं जानता हूँ कि तुम्हारी रानी ने श्येनजित नामक पुत्र को जन्म दिया है, जो तुम्हें अत्यंत प्रिय है और अब दस वर्ष का हो गया है। मेरी आज्ञा से प्रेरित होकर तुम शीघ्र ही इन भयंकर बाणों से अपने उस पुत्र का वध कर डालो।
 
Vaamdev said - O Narendra! I know that your queen has given birth to a son named Shyenajit, who is very dear to you and who is now ten years old. Inspired by my command, you will soon kill that son of yours with these dreadful arrows.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas