श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 192: इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित् का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  3.192.61 
बिभेषि चेत् त्वमधर्मान्नरेन्द्र
प्रयच्छ मे शीघ्रमेवाद्य वाम्यौ।
एतच्छ्रुत्वा वामदेवस्य वाक्यं
स पार्थिव: सूतमुवाच रोषात्॥ ६१॥
 
 
अनुवाद
"राजन्! यदि आपको अन्याय का भय है, तो शीघ्र ही मेरे वामहस्त घोड़े मुझे लौटा दीजिये।" वामदेव के ये वचन सुनकर राजा ने क्रोधित होकर अपने सारथि से कहा-॥61॥
 
"King! If you fear injustice, then quickly return my left-handed horses to me." On hearing these words of Vaamdev, the king angrily said to his charioteer -॥ 61॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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