श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 192: इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित् का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  3.192.58 
इक्ष्वाकवो यदि वा मां त्यजेयु-
र्विधेया मे यदि चेमे विशोऽपि।
नोत्स्रक्ष्येऽहं वामदेवस्य वाम्यौ
नैवंविधा धर्मशीला भवन्ति॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
यदि इक्ष्वाकुवंश के लोग और मेरी आज्ञाकारी प्रजा मुझे त्याग भी दें, तो भी मैं इन वामदेव नामक घोड़ों को कभी नहीं दूँगा, क्योंकि इनके समान लोग पुण्यात्मा नहीं होते।॥58॥
 
Even if the people of the Ikshvaku dynasty and my obedient subjects abandon me, I will never give away these horses named Vamdev, because people like them are not virtuous.'॥ 58॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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