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mahabharat 3.192.57: मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन ! वामदेवजी के इतना कहते ही वहाँ भयंकर रूप वाले चार राक्षस प्रकट हुए। उनके हाथों में त्रिशूल थे। जब वे राजा पर आक्रमण करने लगे, तब राजा ने ऊँची वाणी में यह कहा -॥57॥   |   mahabharat अध्याय 3.192: इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित् का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 192: इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित् का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  3.192.57 
मार्कण्डेय उवाच
एवमुक्ते वामदेवेन राजन्
समुत्तस्थू राक्षसा घोररूपा:।
तै: शूलहस्तैर्वध्यमान: स राजा
प्रोवाचेदं वाक्यमुच्चैस्तदानीम्॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन ! वामदेवजी के इतना कहते ही वहाँ भयंकर रूप वाले चार राक्षस प्रकट हुए। उनके हाथों में त्रिशूल थे। जब वे राजा पर आक्रमण करने लगे, तब राजा ने ऊँची वाणी में यह कहा -॥57॥
 
Markandeya says - King! As soon as Vaamdev finished saying this, four demons with fierce forms appeared there. They had tridents in their hands. When they started attacking the king, then the king said this in a loud voice -॥ 57॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)