श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 192: इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित् का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  3.192.55 
राजोवाच
न ब्राह्मणेभ्यो मृगया प्रसूता
न त्वानुशास्म्यद्यप्रभृति ह्यसत्यम्।
तवैवाज्ञां सम्प्रणिधाय सर्वां
तथा ब्रह्मन् पुण्यलोकं लभेयम्॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
राजा ने कहा - हे ब्राह्मण! (ये घोड़े शिकार करने के योग्य हैं और) शिकार करना ब्राह्मणों के लिए धर्म नहीं है। यद्यपि तुम झूठे हो, फिर भी मैं तुम्हें दण्ड नहीं दूँगा और आज से तुम्हारी सारी आज्ञा का पालन करूँगा, जिससे मुझे पुण्यलोक की प्राप्ति हो (किन्तु तुम्हें ये घोड़े नहीं मिल सकते)॥55॥
 
The king said - O Brahman! (These horses are suitable for hunting and) hunting is not the rule for Brahmins. Although you are a liar, I will not punish you and from today onwards I will follow all your orders, so that I can attain the virtuous world (but you cannot get these horses). ॥ 55॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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