श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 192: इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित् का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  3.192.50 
वामदेव उवाच
छन्दांसि वै मादृशं संवहन्ति
लोकेऽमुष्मिन् पार्थिव यानि सन्ति।
अस्मिंस्तु लोके मम यानमेत-
दस्मद्विधानामपरेषां च राजन्॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
वामदेव बोले - राजन! इसमें कोई संदेह नहीं कि हम जैसे लोगों के लिए वेदों के मंत्र वाहन का काम करते हैं। किन्तु ये केवल परलोक में ही उपलब्ध होते हैं। इस लोक में ये घोड़े हमारे जैसे लोगों के तथा अन्य लोगों के भी वाहन हैं।
 
Vaamdev said - King! There is no doubt that for people like us, the mantras of the Vedas serve as vehicles. But they are available only in the next world. In this world, these horses are the vehicles for people like us and others as well. 50.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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