श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 192: इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित् का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  3.192.48 
वामदेव उवाच
प्रयच्छ वाम्यौ मम पार्थिव त्वं
कृतं हि ते कार्यमाभ्यामशक्यम्।
मा त्वा वधीद् वरुणो घोरपाशै-
र्ब्रह्मक्षत्रस्यान्तरे वर्तमानम्॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
तब वामदेव ने कहा - हे राजन! अब मेरे वाम्य घोड़े मुझे लौटा दो। निश्चय ही उन घोड़ों की सहायता से तुम्हारा असंभव कार्य पूर्ण हो गया है। इस समय तुम ब्राह्मणों और क्षत्रियों के बीच उपस्थित हो। हो सकता है कि तुम्हारे असत्य बोलने के कारण राजा वरुण तुम्हें अपने भयंकर पाश में बाँध लें। 48.
 
Then Vaamdev said - O King! Now return my Vaamya horses to me. Certainly your impossible task has been accomplished with the help of those horses. At this time you are present between Brahmins and Kshatriyas. It may happen that due to your untruthfulness, King Varuna ties you with his dreadful noose. 48.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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