| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 192: इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित् का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता » श्लोक 45-46 |
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| | | | श्लोक 3.192.45-46  | स मनसा विचिन्त्य मासि पूर्णे शिष्यमब्रवीत्॥ ४५॥
गच्छात्रेय राजानं ब्रूहि यदि पर्याप्तं निर्यातयोपाध्यायवाम्याविति। स गत्वैवं तं राजानमब्रवीत् तं राजा प्रत्युवाच राज्ञामेतद्वाहनमनर्हा ब्राह्मणा रत्नानामेवंविधानां किं ब्राह्मणानामश्वै: कार्यं साधु गम्यताम्॥ ४६॥ | | | | | | अनुवाद | | जब गहन चिंतन करते-करते एक मास बीत गया, तब उन्होंने अपने शिष्य से कहा, 'आत्रेय! जाकर राजा से कहो कि यदि कार्य पूर्ण हो जाए, तो गुरुजी के छोड़े हुए दोनों घोड़े लौटा दो।' शिष्य ने जाकर राजा से वही बात दोहराई। तब राजा ने उससे कहा, 'यह सवारी तो राजाओं के योग्य है। ब्राह्मणों को ऐसे रत्न रखने का अधिकार नहीं है। अच्छा, ब्राह्मणों का घोड़ों से क्या लेना-देना? अब तुम सकुशल लौट जाओ।'॥45-46॥ | | | | ‘When one month passed by while he was thinking deeply, he said to his disciple, ‘Aatreya! Go and tell the king that if the work is done, then return the two left horses of the Guruji.’ The disciple went and repeated the same thing to the king. Then the king replied to him, ‘This ride is fit for kings. Brahmins do not have the right to keep such gems. Well, what do Brahmins have to do with horses? Now you return safely.’॥ 45-46॥ | | ✨ ai-generated | | |
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