श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 192: इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित् का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  3.192.42 
अथैनमेवं ब्रुवाणमब्रवीद् राजा वामदेवाश्रमं प्रयाहीति स गत्वा वामदेवाश्रमं तमृषिमब्रवीत्॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
सारथि के ऐसा कहने पर राजा ने उसे आज्ञा दी, ‘चलो वामदेव के आश्रम में चलें।’ वामदेव के आश्रम में पहुँचकर राजा ने उन महामुनि से कहा- 42॥
 
When the charioteer said this, the king ordered him, 'Let's go to Vamdev's ashram.' After reaching Vamdev's ashram, the king said to that great sage - 42॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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