श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 192: इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित् का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता  »  श्लोक 34-35
 
 
श्लोक  3.192.34-35 
अथैनां राज्ञे पितादादब्रवीच्चैनामेनं राजानं शुश्रूषस्वेति॥ ३४॥
स एवमुक्त्वा दुहितरं क्रुद्ध: शशाप यस्मात् त्वया राजानो विप्रलब्धा बहवस्तस्मादब्रह्मण्यानि तवापत्यानि भविष्यन्त्यानृतिकत्वात् तवेति॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
तब पिता मण्डूकराज ने अपनी पुत्री सुशोभना को राजा परीक्षित को सौंप दिया और उससे कहा - ‘पुत्री! राजा की सदैव सेवा करो।’ ऐसा कहकर जब मण्डूकराज को अपनी पुत्री का अपराध याद आया, तब उन्होंने क्रोधित होकर उसे शाप दे दिया - ‘हे! तूने अनेक राजाओं को धोखा दिया है, इसलिए तेरी सन्तान ब्राह्मण-विरोधी होगी; क्योंकि तू बड़ी मिथ्याचारिणी है।’॥34-35॥
 
‘Then the father Mandukaraja handed over his daughter Sushobhana to King Parikshit and said to her- ‘Daughter! Always serve the king.’ After saying this, when Mandukaraja remembered his daughter's crime, he became angry and cursed her saying- ‘O! You have deceived many kings, therefore your children will be anti-brahmin; because you are a big liar.'॥ 34-35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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