श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 192: इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित् का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  3.192.32 
स तद् वाक्यमुपलभ्य व्यथितेन्द्रियमना: प्रोवाच प्रसीद राजन्नहमायुर्नाम मण्डूकराजो मम सा दुहिता सुशोभना नाम। तस्या हि दौ:शील्यमेतद् बहवस्तया राजानो विप्रलब्धा: पूर्वा इति॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
राजा के वचन सुनकर मेंढकराज का मन और इन्द्रियाँ व्यथित हो उठीं। उसने कहा, "महाराज! प्रसन्न होइए। मेरा नाम आयु है। मैं मेंढकों का राजा हूँ। जिसे आप अपनी प्रियतमा कहते हैं, वह मेरी ही पुत्री है। उसका नाम सुशोभना है। वह आपको छोड़कर चली गई, यह उसकी दुष्टता है। उसने पहले भी अनेक राजाओं को धोखा दिया है।"
 
On hearing the king's words, the mind and senses of the frog king became distressed. He said, "Maharaj! Be happy. My name is Aayu. I am the king of frogs. The one whom you call your beloved is my own daughter. Her name is Shushobhana. She left you and went away, this is her wickedness. She has deceived many kings before as well."
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas