श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 192: इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित् का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  3.192.31 
न हि क्षम्यते तन्मया हनिष्याम्येतानेतैर्दुरात्मभि: प्रिया मे भक्षिता सर्वथैव मे वध्या मण्डूका नार्हसि विद्वन् मामुपरोद्‍धुमिति॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
मैं क्षमा नहीं कर सकता। मैं इन मेंढकों को अवश्य मार डालूँगा। इन दुष्टात्माओं ने मेरे प्रियतम को खा लिया है। अतः इन मेंढकों को मुझे अवश्य मारना चाहिए। विद्वान्! कृपया मुझे इन्हें मारने से न रोकें।॥31॥
 
I cannot forgive. I will surely kill these frogs. These evil spirits have eaten my beloved. Therefore these frogs are absolutely to be killed by me. Scholar! Please do not stop me from killing them.'॥ 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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