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श्लोक 3.192.27  |
| मा राजन् क्रोधवशं गम: प्रसादं कुरु नार्हसि मण्डूकानामनपराधिनां वधं कर्तुमिति। श्लोकौ चात्र भवत:—॥ २७॥ |
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| अनुवाद |
| ‘हे राजन! क्रोध में मत डूबो। हम पर दया करो। निर्दोष मेंढकों को मत मरवाओ।’ इस संदर्भ में ये दो श्लोक भी प्रसिद्ध हैं-॥27॥ |
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| ‘O King! Do not be overcome by anger. Be kind to us. Do not get the innocent frogs killed.’ These two verses are also famous in this context -॥ 27॥ |
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