श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 192: इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित् का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  3.192.25 
अथ मण्डूकवधे घोरे क्रियमाणे दिक्षु सर्वासु मण्डूकान् भयमाविवेश। ते भीता मण्डूकराज्ञे यथावृत्तं न्यवेदयन्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
इस आदेश के अनुसार सर्वत्र मेंढकों का भयंकर संहार होने लगा। इससे सब दिशाओं के मेंढकों के हृदय भय से भर गए। वे भयभीत होकर मेंढकराज के पास गए और उन्हें सारा वृत्तांत विस्तारपूर्वक सुनाया॥ 25॥
 
‘According to this order, a terrible massacre of frogs began everywhere. This filled the hearts of frogs in all directions with fear. They went to the King of Frogs in fear and told him the entire incident in detail.॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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