श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 192: इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित् का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  3.192.19 
स तस्य वचनात् तयैव सह देव्या तद् वनं प्राविशत्। स कदाचित् तस्मिन् कानने रम्ये तयैव सह व्यवाहरदथ क्षुत्तृष्णार्दित: श्रान्तोऽतिमुक्तकागारमपश्यत्॥ १९॥
 
 
अनुवाद
मंत्री के कहने पर राजा ने नवविवाहिता रानी के साथ वन में प्रवेश किया। एक दिन महाराज परीक्षित अपनी प्रियतमा के साथ उस सुन्दर उद्यान में विहार कर रहे थे। विहार करते-करते जब वे थक गए और भूख-प्यास से अत्यन्त व्याकुल हो गए, तब उन्हें बसन्त लताओं से बना एक सुन्दर मंडप दिखाई दिया॥19॥
 
‘At the behest of the minister, the king entered the forest with the newly married queen. One day Maharaja Parikshit was strolling in that beautiful garden with his beloved. While strolling, when he got tired and was very much troubled by hunger and thirst, then he saw a beautiful pavilion made of spring creepers.॥19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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