|
| |
| |
श्लोक 3.191.35  |
तथा कथां शुभां श्रुत्वा मार्कण्डेयस्य धीमत:।
विस्मिता: समपद्यन्त पुराणस्य निवेदनात्॥ ३५॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| बुद्धिमान मार्कण्डेयजी के मुख से उस शुभ कथा को सुनकर और प्राचीन बातों का ज्ञान पाकर सब लोग बहुत आश्चर्यचकित और प्रसन्न हुए॥35॥ |
| |
| After listening to that auspicious story from the mouth of wise Markandeyaji and getting knowledge of the ancient things, everyone was very surprised and happy. 35॥ |
| |
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि युधिष्ठिरानुशासने एकनवत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १९१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें युधिष्ठिरके लिये उपदेशविषयक एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १९१॥
|
| |
| ✨ ai-generated |
| |
|