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श्लोक 3.191.31-33h  |
युधिष्ठिर उवाच
यत् त्वयोक्तं द्विजश्रेष्ठ वाक्यं श्रुतिमनोहरम्॥ ३१॥
तथा करिष्ये यत्नेन भवत: शासनं विभो।
न मे लोभोऽस्ति विप्रेन्द्र न भयं न च मत्सर:॥ ३२॥
करिष्यामि हि तत् सर्वमुक्तं यत् ते मयि प्रभो। |
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| अनुवाद |
| युधिष्ठिर बोले - हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! आपने जो उपदेश दिया है, वह मेरे कानों को मधुर और मन को प्रसन्न करने वाला है। हे प्रभु! मैं आपकी आज्ञा का यत्नपूर्वक पालन करूँगा। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! मेरे मन में लोभ, भय और ईर्ष्या का भाव नहीं है। प्रभु! आपने मेरे लिए जो कहा है, मैं उसका अवश्य पालन करूँगा। |
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| Yudhishthira said - O best of Brahmins! The advice you have given me is sweet to my ears and pleasing to my mind. O Lord! I will follow your instructions diligently. O best of Brahmins! There is no greed, fear and jealousy in my mind. Lord! I will definitely follow what you have said for me. |
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