श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 191: भगवान् कल्कीके द्वारा सत्ययुगकी स्थापना और मार्कण्डेयजीका युधिष्ठिरके लिये धर्मोपदेश  »  श्लोक 23-24
 
 
श्लोक  3.191.23-24 
मार्कण्डेय उवाच
दयावान् सर्वभूतेषु हितो रक्तोऽनसूयक:॥ २३॥
सत्यवादी मृदुर्दान्त: प्रजानां रक्षणे रत:।
चर धर्मं त्यजाधर्मं पितॄन् देवांश्च पूजय॥ २४॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेयजी बोले- राजन! सब जीवों पर दया करो। सबके हितैषी बने रहो। सबके प्रति प्रेम रखो और किसी में दोष न देखो। सत्यवादी, मृदुल, सतर्क और प्रजापालन में तत्पर होकर धर्म का आचरण करो। अधर्म को दूर रखो और देवताओं तथा पितरों का पूजन करते रहो। 23-24॥
 
Markandeyaji said- Rajan! Be kind to all living beings. Remain well-wishers of all. Have love for everyone and do not find fault in anyone. Practice dharma by being truthful, soft-natured, alert and ready to obey the people. Leave unrighteousness at a distance and keep worshiping Gods and ancestors. 23-24॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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