श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 191: भगवान् कल्कीके द्वारा सत्ययुगकी स्थापना और मार्कण्डेयजीका युधिष्ठिरके लिये धर्मोपदेश  »  श्लोक 22-23h
 
 
श्लोक  3.191.22-23h 
कस्मिन् धर्मे मया स्थेयं प्रजा: संरक्षता मुने॥ २२॥
कथं च वर्तमानो वै न च्यवेयं स्वधर्मत:।
 
 
अनुवाद
‘मुनि! प्रजा की रक्षा करते हुए किस धर्म में दृढ़ रहना चाहिए? मेरा आचरण और व्यवहार कैसा होना चाहिए कि मैं अपने धर्म से कभी विचलित न होऊँ?’॥22 1/2॥
 
‘Muni! While protecting the people, in which Dharma should one remain steadfast? What should be my conduct and behavior so that I never deviate from my own Dharma?’॥ 22 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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