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श्लोक 3.191.14-15  |
एष धर्म: कृतयुगे त्रेतायां द्वापरे तथा॥ १४॥
पश्चिमे युगकाले च य: स ते सम्प्रकीर्तित:।
सर्वलोकस्य विदिता युगसंख्या च पाण्डव॥ १५॥ |
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| अनुवाद |
| सत्ययुग में धर्म का यही स्वरूप अक्षुण्ण रहेगा। त्रेता, द्वापर और कलियुग में धर्म की स्थिति का वर्णन आपसे किया गया है। पाण्डुनन्दन! आपको सम्पूर्ण जगत् की युग-संख्या का भी ज्ञान हो गया है। 14-15॥ |
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| This form of religion will remain intact in Satyayuga. The condition of religion in Treta, Dwapara and Kaliyuga has been described to you. Pandunandan! You have also got the knowledge of the era-number of the entire world. 14-15॥ |
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