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mahabharat 3.19.20: वह बाण समस्त यादव समाज द्वारा पूजनीय था, विषधर सर्प के समान विषैला था और प्रज्वलित अग्नि के समान चमक रहा था। उस बाण को धनुष पर चढ़ा हुआ देखकर अन्तरिक्ष में हाहाकार मच गया।   |   mahabharat अध्याय 3.19: प्रद्युम्नके द्वारा शाल्वकी पराजय   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.19.20 
तमर्चितं सर्वदशार्हपूगै-
राशीविषाग्निज्वलनप्रकाशम्।
दृष्ट्वा शरं ज्यामभिनीयमानं
बभूव हाहाकृतमन्तरिक्षम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
वह बाण समस्त यादव समाज द्वारा पूजनीय था, विषधर सर्प के समान विषैला था और प्रज्वलित अग्नि के समान चमक रहा था। उस बाण को धनुष पर चढ़ा हुआ देखकर अन्तरिक्ष में हाहाकार मच गया।
 
That arrow was respected by the entire Yadava community, was as poisonous as a venomous snake and shone like a blazing fire. Seeing that arrow being placed on the bowstring, there was an uproar in the outer space.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)