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mahabharat 3.19.2: 'रुक्मिणी नंदन! युद्धभूमि में घोड़ों की लगाम संभालते समय मुझे तनिक भी भय नहीं लगता। मैं वृष्णि वंश के युद्ध नियमों को भी जानता हूँ। आपने जो कहा है, उसमें कुछ भी भिन्न नहीं है।॥ 2॥   |   mahabharat अध्याय 3.19: प्रद्युम्नके द्वारा शाल्वकी पराजय   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 19: प्रद्युम्नके द्वारा शाल्वकी पराजय  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.19.2 
न मे भयं रौक्मिणेय संग्रामे यच्छतो हयान्।
युद्धज्ञोऽस्मि च वृष्णीनां नात्र किंचिदतोऽन्यथा॥ २॥
 
 
अनुवाद
'रुक्मिणी नंदन! युद्धभूमि में घोड़ों की लगाम संभालते समय मुझे तनिक भी भय नहीं लगता। मैं वृष्णि वंश के युद्ध नियमों को भी जानता हूँ। आपने जो कहा है, उसमें कुछ भी भिन्न नहीं है।॥ 2॥
 
'Rukmini Nandan! I do not feel even a bit afraid while handling the reins of horses in the battlefield. I also know the war rules of the Vrishni clan. There is nothing different in what you have said.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)