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mahabharat 3.189.58: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! मार्कण्डेय मुनि की यह बात सुनकर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन तथा नररत्न नकुल और सहदेव, ये सभी द्रौपदी सहित उठकर भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में प्रणाम करने लगे॥58॥   |   mahabharat अध्याय 3.189: भगवान् बालमुकुन्दका मार्कण्डेयको अपने स्वरूपका परिचय देना तथा मार्कण्डेयद्वारा श्रीकृष्णकी महिमाका प्रतिपादन और पाण्डवोंका श्रीकृष्णकी शरणमें जाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 189: भगवान् बालमुकुन्दका मार्कण्डेयको अपने स्वरूपका परिचय देना तथा मार्कण्डेयद्वारा श्रीकृष्णकी महिमाका प्रतिपादन और पाण्डवोंका श्रीकृष्णकी शरणमें जाना  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  3.189.58 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ताश्च ते पार्था यमौ च पुरुषर्षभौ।
द्रौपद्या सहिता: सर्वे नमश्चक्रुर्जनार्दनम्॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! मार्कण्डेय मुनि की यह बात सुनकर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन तथा नररत्न नकुल और सहदेव, ये सभी द्रौपदी सहित उठकर भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में प्रणाम करने लगे॥58॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! On hearing this from Markandeya Muni, Kunti's son Yudhishthir, Bhima and Arjun and the gems of men Nakul and Sahadev all of them along with Draupadi got up and bowed at the feet of Lord Krishna. 58॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)