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mahabharat 3.189.53: हे कुन्तीपुत्र! उन्हीं के वरदान के कारण मैं अपने पूर्वजन्म को नहीं भूलता। मेरी दीर्घायु और मुक्त मृत्यु भी उन्हीं की कृपा का परिणाम है।   |   mahabharat अध्याय 3.189: भगवान् बालमुकुन्दका मार्कण्डेयको अपने स्वरूपका परिचय देना तथा मार्कण्डेयद्वारा श्रीकृष्णकी महिमाका प्रतिपादन और पाण्डवोंका श्रीकृष्णकी शरणमें जाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 189: भगवान् बालमुकुन्दका मार्कण्डेयको अपने स्वरूपका परिचय देना तथा मार्कण्डेयद्वारा श्रीकृष्णकी महिमाका प्रतिपादन और पाण्डवोंका श्रीकृष्णकी शरणमें जाना  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  3.189.53 
अस्यैव वरदानाद्धि स्मृतिर्न प्रजहाति माम्।
दीर्घमायुश्च कौन्तेय स्वच्छन्दमरणं मम॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! उन्हीं के वरदान के कारण मैं अपने पूर्वजन्म को नहीं भूलता। मेरी दीर्घायु और मुक्त मृत्यु भी उन्हीं की कृपा का परिणाम है।
 
O son of Kunti! It is because of His boon that I do not forget my past life. My long life and free death are also the result of His grace.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)