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mahabharat 3.189.50: मार्कण्डेयजी कहते हैं - पितामह युधिष्ठिर! ऐसा कहकर परम अद्भुत देव भगवान बालमुकुन्द अन्तर्धान हो गए। उनके अन्तर्धान होते ही मैंने देखा कि ये नाना प्रकार के विचित्र लोग ज्यों के त्यों उत्पन्न हो गए हैं।   |   mahabharat अध्याय 3.189: भगवान् बालमुकुन्दका मार्कण्डेयको अपने स्वरूपका परिचय देना तथा मार्कण्डेयद्वारा श्रीकृष्णकी महिमाका प्रतिपादन और पाण्डवोंका श्रीकृष्णकी शरणमें जाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 189: भगवान् बालमुकुन्दका मार्कण्डेयको अपने स्वरूपका परिचय देना तथा मार्कण्डेयद्वारा श्रीकृष्णकी महिमाका प्रतिपादन और पाण्डवोंका श्रीकृष्णकी शरणमें जाना  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  3.189.50 
मार्कण्डेय उवाच
इत्युक्त्वान्तर्हितस्तात स देव: परमाद्‍भुत:।
प्रजाश्चेमा: प्रपश्यामि विचित्रा विविधा: कृता:॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेयजी कहते हैं - पितामह युधिष्ठिर! ऐसा कहकर परम अद्भुत देव भगवान बालमुकुन्द अन्तर्धान हो गए। उनके अन्तर्धान होते ही मैंने देखा कि ये नाना प्रकार के विचित्र लोग ज्यों के त्यों उत्पन्न हो गए हैं।
 
Markandeyji says - Father Yudhishthira! After saying this, the most wonderful deity Lord Balmukunda disappeared. As soon as he disappeared, I saw that these various types of strange people have been created just as they were. 50.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)