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mahabharat 3.189.40-42h: ब्रह्मर्षे! मैं शंख, चक्र और गदा धारण करने वाला विश्वात्मा नारायण हूँ। सहस्रयुग के अंत में होने वाला प्रलयकाल रहने तक मैं समस्त प्राणियों को मोहित करके (महानिद्रा के भ्रम से) जल में शयन करता हूँ। मुनिश्रेष्ठ! यद्यपि मैं बालक नहीं हूँ, फिर भी ब्रह्मा के जागने तक मैं सदैव बालक रूप में यहाँ स्थित रहता हूँ। 40-41 1/2"   |   mahabharat अध्याय 3.189: भगवान् बालमुकुन्दका मार्कण्डेयको अपने स्वरूपका परिचय देना तथा मार्कण्डेयद्वारा श्रीकृष्णकी महिमाका प्रतिपादन और पाण्डवोंका श्रीकृष्णकी शरणमें जाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 189: भगवान् बालमुकुन्दका मार्कण्डेयको अपने स्वरूपका परिचय देना तथा मार्कण्डेयद्वारा श्रीकृष्णकी महिमाका प्रतिपादन और पाण्डवोंका श्रीकृष्णकी शरणमें जाना  »  श्लोक 40-42h
 
 
श्लोक  3.189.40-42h 
अहं नारायणो नाम शङ्खचक्रगदाधर:।
यावद्युगानां विप्रर्षे सहस्रपरिवर्तनात्॥ ४०॥
तावत् स्वपिमि विश्वात्मा सर्वभूतानि मोहयन्।
एवं सर्वमहं कालमिहास्से मुनिसत्तम॥ ४१॥
अशिशु: शिशुरूपेण यावद्‍ब्रह्मा न बुध्यते।
 
 
अनुवाद
ब्रह्मर्षे! मैं शंख, चक्र और गदा धारण करने वाला विश्वात्मा नारायण हूँ। सहस्रयुग के अंत में होने वाला प्रलयकाल रहने तक मैं समस्त प्राणियों को मोहित करके (महानिद्रा के भ्रम से) जल में शयन करता हूँ। मुनिश्रेष्ठ! यद्यपि मैं बालक नहीं हूँ, फिर भी ब्रह्मा के जागने तक मैं सदैव बालक रूप में यहाँ स्थित रहता हूँ। 40-41 1/2"
 
Brahmarshe! I am Narayana, the universal soul, who holds the conch, disc and mace. As long as the destruction that occurs at the end of Sahasra Yuga lasts, I sleep (in water) after captivating all the living beings (with the illusion of great sleep). Munishrestha! Even though I am not a child, I always remain here in the form of a child until Brahma awakens. 40-41 1/2"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)