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mahabharat 3.189.22-23: हे ब्रह्मन्! जिन शुभ कर्मों से मनुष्य कल्याण को प्राप्त होता है, सत्य, दान, घोर तप और किसी भी जीव को कष्ट न पहुँचाने का स्वभाव - ये सब मेरे विधान से उत्पन्न हुए हैं और मेरे शरीर में निवास करते हैं। जब मैं सभी जीवों का ज्ञान प्रकट करता हूँ, तभी वे क्रियाशील होते हैं, अन्यथा वे अपनी इच्छा के अनुसार कुछ भी नहीं कर सकते।   |   mahabharat अध्याय 3.189: भगवान् बालमुकुन्दका मार्कण्डेयको अपने स्वरूपका परिचय देना तथा मार्कण्डेयद्वारा श्रीकृष्णकी महिमाका प्रतिपादन और पाण्डवोंका श्रीकृष्णकी शरणमें जाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 189: भगवान् बालमुकुन्दका मार्कण्डेयको अपने स्वरूपका परिचय देना तथा मार्कण्डेयद्वारा श्रीकृष्णकी महिमाका प्रतिपादन और पाण्डवोंका श्रीकृष्णकी शरणमें जाना  »  श्लोक 22-23
 
 
श्लोक  3.189.22-23 
प्राप्नुवन्ति नरा विप्र यत् कृत्वा कर्म शोभनम्।
सत्यं दानं तपश्चोग्रमहिंसा चैव जन्तुषु॥ २२॥
मद्विधानेन विहिता मम देहविहारिण:।
मयाऽऽविर्भूूतविज्ञाना विचेष्टन्ते न कामत:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मन्! जिन शुभ कर्मों से मनुष्य कल्याण को प्राप्त होता है, सत्य, दान, घोर तप और किसी भी जीव को कष्ट न पहुँचाने का स्वभाव - ये सब मेरे विधान से उत्पन्न हुए हैं और मेरे शरीर में निवास करते हैं। जब मैं सभी जीवों का ज्ञान प्रकट करता हूँ, तभी वे क्रियाशील होते हैं, अन्यथा वे अपनी इच्छा के अनुसार कुछ भी नहीं कर सकते।
 
O Brahman! The auspicious deeds by which a man attains welfare, truth, charity, severe penance and the nature of not harming any living being - all these have been created by my law and reside in my body. When I reveal the knowledge of all living beings, only then they become active, otherwise they cannot do anything according to their will.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)