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mahabharat 3.189.21: हे महामुनि! काम, क्रोध, हर्ष, भय और मोह - इन सब भावों को मेरे ही केशों के समान समझो ॥ 21॥   |   mahabharat अध्याय 3.189: भगवान् बालमुकुन्दका मार्कण्डेयको अपने स्वरूपका परिचय देना तथा मार्कण्डेयद्वारा श्रीकृष्णकी महिमाका प्रतिपादन और पाण्डवोंका श्रीकृष्णकी शरणमें जाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 189: भगवान् बालमुकुन्दका मार्कण्डेयको अपने स्वरूपका परिचय देना तथा मार्कण्डेयद्वारा श्रीकृष्णकी महिमाका प्रतिपादन और पाण्डवोंका श्रीकृष्णकी शरणमें जाना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  3.189.21 
कामं क्रोधं च हर्षं च भयं मोहं तथैव च।
ममैव विद्धि रोमाणि सर्वाण्येतानि सत्तम॥ २१॥
 
 
अनुवाद
हे महामुनि! काम, क्रोध, हर्ष, भय और मोह - इन सब भावों को मेरे ही केशों के समान समझो ॥ 21॥
 
O great saint! Lust, anger, joy, fear and attachment - consider all these emotions as my own hair. ॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)