Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.189.17-20: मैं ही प्रलय करने वाली अग्नि हूँ। मैं ही प्रलय करने वाली अग्नि हूँ। मैं ही प्रलय करने वाला सूर्य हूँ और मैं ही प्रलय करने वाली वायु हूँ। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! आकाश में दिखाई देने वाले समस्त तारों को मेरे रोमछिद्र समझो। रत्नाकर सागर और चारों दिशाओं को मेरा वस्त्र, शय्या और निवास समझो। देवताओं के कार्यसिद्धि के लिए मैंने इन्हें पृथक-पृथक उत्पन्न किया है।॥17-20॥ | mahabharat अध्याय 3.189: भगवान् बालमुकुन्दका मार्कण्डेयको अपने स्वरूपका परिचय देना तथा मार्कण्डेयद्वारा श्रीकृष्णकी महिमाका प्रतिपादन और पाण्डवोंका श्रीकृष्णकी शरणमें जाना । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
मैं ही प्रलय करने वाली अग्नि हूँ। मैं ही प्रलय करने वाली अग्नि हूँ। मैं ही प्रलय करने वाला सूर्य हूँ और मैं ही प्रलय करने वाली वायु हूँ। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! आकाश में दिखाई देने वाले समस्त तारों को मेरे रोमछिद्र समझो। रत्नाकर सागर और चारों दिशाओं को मेरा वस्त्र, शय्या और निवास समझो। देवताओं के कार्यसिद्धि के लिए मैंने इन्हें पृथक-पृथक उत्पन्न किया है।॥17-20॥
I am the fire that causes destruction. I am the fire that causes destruction. I am the sun that causes destruction and I am the wind that causes destruction. O best of the Brahmins! Consider all the stars that are visible in the sky as my pores. Consider the Ratnakar ocean and the four directions as my clothes, bed and abode. I have created them separately for the success of the tasks of the gods.॥17-20॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥