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mahabharat 3.189.14-15h: ये शूद्र मेरे दो पैर हैं। ये मेरी शक्ति से क्रमशः उत्पन्न हुए हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद - ये मुझसे ही उत्पन्न होते हैं और मुझमें ही विलीन हो जाते हैं॥14 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 3.189: भगवान् बालमुकुन्दका मार्कण्डेयको अपने स्वरूपका परिचय देना तथा मार्कण्डेयद्वारा श्रीकृष्णकी महिमाका प्रतिपादन और पाण्डवोंका श्रीकृष्णकी शरणमें जाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 189: भगवान् बालमुकुन्दका मार्कण्डेयको अपने स्वरूपका परिचय देना तथा मार्कण्डेयद्वारा श्रीकृष्णकी महिमाका प्रतिपादन और पाण्डवोंका श्रीकृष्णकी शरणमें जाना  »  श्लोक 14-15h
 
 
श्लोक  3.189.14-15h 
पादौ शूद्रा भवन्तीमे विक्रमेण क्रमेण च।
ऋग्वेद: सामवेदश्च यजुर्वेदोऽप्यथर्वण:॥ १४॥
मत्त: प्रादुर्भवन्त्येते मामेव प्रविशन्ति च।
 
 
अनुवाद
ये शूद्र मेरे दो पैर हैं। ये मेरी शक्ति से क्रमशः उत्पन्न हुए हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद - ये मुझसे ही उत्पन्न होते हैं और मुझमें ही विलीन हो जाते हैं॥14 1/2॥
 
These Shudras are my two feet. They have emerged gradually from my power. Rigveda, Yajurveda, Samveda and Atharvaveda - they emerge from me and dissolve in me.॥ 14 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)