श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक d1h-109
 
 
श्लोक  3.188.d1h-109 
पश्यामि च महीं राजन् काननैरुपशोभिताम्।
(सपर्वतवनद्वीपां निमग्नाशतसङ्कुलाम्।)
यजन्ते हि तदा राजन् ब्राह्मणा बहुभिर्मखै:॥ १०९॥
 
 
अनुवाद
राजन! वहाँ की भूमि नाना प्रकार के वनों से सुशोभित, पर्वतों, वनों और द्वीपों से सुशोभित तथा सैकड़ों नदियों से युक्त प्रतीत होती थी। ब्राह्मण नाना प्रकार के यज्ञों द्वारा भगवान यज्ञपुरुष की पूजा करते थे॥109॥
 
Rajan! The land there appeared to be adorned with various forests, adorned with mountains, forests and islands and joined with hundreds of rivers. Brahmins used to worship Lord Yajnapurusha through various types of yagyas. 109॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)