श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 95
 
 
श्लोक  3.188.95 
अतसीपुष्पवर्णाभ: श्रीवत्सकृतभूषण:।
साक्षाल्लक्ष्म्या इवावास: स तदा प्रतिभाति मे॥ ९५॥
 
 
अनुवाद
उसके अंग सन के पुष्पों के समान काले थे। उसकी छाती श्रीवत्स चिन्ह से सुशोभित थी। उस समय वह मुझे लक्ष्मीजी के निवास के समान प्रतीत हुई ॥95॥
 
His limbs were black like flax flowers. His chest was adorned with the Srivatsa symbol. At that time it appeared to me like the abode of Goddess Lakshmi. 95॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)