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mahabharat 3.188.94: हे मनुष्यों के स्वामी! यद्यपि मैं भूत, वर्तमान और भविष्य को जानता था, मैंने उन पर गहन चिंतन और मनन भी किया, फिर भी मैं उस बालक के बारे में कुछ भी पता नहीं लगा सका।   |   mahabharat अध्याय 3.188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 94
 
 
श्लोक  3.188.94 
तपसा चिन्तयंश्चापि तं शिशुं नोपलक्षये।
भूतं भव्यं भविष्यं च जानन्नपि नराधिप॥ ९४॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! यद्यपि मैं भूत, वर्तमान और भविष्य को जानता था, मैंने उन पर गहन चिंतन और मनन भी किया, फिर भी मैं उस बालक के बारे में कुछ भी पता नहीं लगा सका।
 
O Lord of men! Even though I knew about the past, the present and the future, I did deep meditation and contemplation on them, but still I could not find out anything about that child.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)