श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 93
 
 
श्लोक  3.188.93 
ततो मे पृथिवीपाल विस्मय: सुमहानभूत्।
कथं त्वयं शिशु: शेते लोके नाशमुपागते॥ ९३॥
 
 
अनुवाद
पृथ्वीनाथ! उसे देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मैं सोचने लगा- ‘सारी सृष्टि नष्ट हो जाने पर भी यह बालक यहाँ कैसे सो रहा है?’॥ 93॥
 
Prithvinath! I was very surprised to see him. I started thinking- 'How is this child sleeping here even after the whole world is destroyed?'॥ 93॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)