श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 91-92
 
 
श्लोक  3.188.91-92 
शाखायां तस्य वृक्षस्य विस्तीर्णायां नराधिप।
पर्यङ्के पृथिवीपाल दिव्यास्तरणसंस्तृते॥ ९१॥
उपविष्टं महाराज पद्मेन्दुसदृशाननम्।
फुल्लपद्मविशालाक्षं बालं पश्यामि भारत॥ ९२॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के राजा! उस वृक्ष की चौड़ी शाखा पर एक शय्या थी, जिस पर दिव्य शय्या बिछी हुई थी। महाराज! उस शय्या पर एक सुन्दर बालक बैठा हुआ दिखाई दिया, जिसका मुख कमल के समान मनोहर और चन्द्रमा के समान नेत्रों को सुखदायक था। उसके नेत्र खिले हुए कमल की पंखुड़ियों के समान बड़े थे। 91-92।
 
O king of men! There was a bed on the broad branch of that tree, on which divine bedding was spread. Maharaj! A beautiful boy was seen sitting on that bed, whose face was as graceful as a lotus and as pleasing to the eyes as the moon. His eyes were as large as blooming lotus petals. 91-92.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)