श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  3.188.9-10 
नारायणाङ्कप्रख्यस्त्वं साम्परायेऽतिपठॺसे।
भगवाननेकश: कृत्वा त्वया विष्णोश्च विश्वकृत्॥ ९॥
कर्णिकोद्धरणं दिव्यं ब्रह्मण: कामरूपिण:।
रत्नालंकारयोगाभ्यां दृग्भ्यां दृष्टस्त्वया पुरा॥ १०॥
 
 
अनुवाद
आप भगवान नारायण के भक्तों में सर्वश्रेष्ठ हैं। परलोक में आपकी कीर्ति सर्वत्र गाई जाती है। आपने (योग कला द्वारा) हृदयकमल के कवच को अलौकिक रूप से खोलकर, वैराग्य और अभ्यास से प्राप्त दिव्य दृष्टि द्वारा, जो स्वेच्छा से प्रकट होने वाले सर्वव्यापी ब्रह्म की प्राप्ति का स्थान है, अनेक बार जगत् के रचयिता का दर्शन किया है। ॥9-10॥
 
You are the best among the devotees of Lord Narayana. Your glory is sung everywhere in the next world. You have seen the creator of the universe many times by supernaturally opening the carapace of the heart lotus (by the art of yoga), which is the place of attainment of the omnipresent Brahman who appears voluntarily, through the divine vision obtained through detachment and practice. ॥9-10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)