श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 89
 
 
श्लोक  3.188.89 
तत: सुदीर्घं गत्वाहं प्लवमानो नराधिप।
श्रान्त: क्वचिन्न शरणं लभाम्यहमतन्द्रित:॥ ८९॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! उस समय मैं आलस्य से रहित होकर बहुत देर तक तैरता रहा और बहुत दूर जाकर बहुत थक गया, परन्तु मुझे कहीं भी आश्रय नहीं मिला। 89.
 
O Lord of men! At that time, being free from laziness, I swam for a long time and became very tired after going far away. But I did not find any shelter anywhere. 89.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)