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mahabharat 3.188.88: हे राजनश्रेष्ठ! समुद्र के प्रचण्ड जल में तैरते समय जब मुझे कोई प्राणी दिखाई नहीं दिया, तब मैं अत्यन्त व्याकुल हो गया।   |   mahabharat अध्याय 3.188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 88
 
 
श्लोक  3.188.88 
एकार्णवे जले घोरे विचरन् पार्थिवोत्तम।
अपश्यन् सर्वभूतानि वैक्लव्यमगमं तत:॥ ८८॥
 
 
अनुवाद
हे राजनश्रेष्ठ! समुद्र के प्रचण्ड जल में तैरते समय जब मुझे कोई प्राणी दिखाई नहीं दिया, तब मैं अत्यन्त व्याकुल हो गया।
 
O best of kings! While swimming in the ferocious waters of the ocean, when I did not see any creature, I became very distressed. 88
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)