श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 188: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान‍्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना  »  श्लोक 86-87
 
 
श्लोक  3.188.86-87 
तस्मिन्नेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे।
नष्टे देवासुरगणे यक्षराक्षसवर्जिते॥ ८६॥
निर्मनुष्ये महीपाल नि:श्वापदमहीरुहे।
अनन्तरिक्षे लोकेऽस्मिन् भ्रमाम्येकोऽहमाहत:॥ ८७॥
 
 
अनुवाद
समस्त जीव-जंतु, देवता और दानवों का नाश हो जाने पर मैं ही यक्ष, राक्षस, मनुष्य, वन्य पशु, वृक्ष और अंतरिक्ष से रहित उस भयंकर समुद्ररूपी लोक में इधर-उधर विचरता हूँ ॥ 86-87॥
 
After the destruction of all living and non-living creatures, gods and demons, I alone wander here and there in that terrible, oceanic world, devoid of Yakshs, demons, human beings, wild animals, trees and space. ॥ 86-87॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)